Tuesday, July 23, 2019

लघुकथा

मजबूत जड़ें

आज सूरज हॉस्टल जा रहा है । लता रसोई में खाना बना रही है पर बार बार ध्यान रमा की बातों की ओर ही जा रहा है ।
"अरे लता ! तुम सूरज को हॉस्टल क्यूँ भेज रही हो! मैंने तो सुना है बच्चे वहाँ जाकर बिगड़ जाते है ।"
"नही नही! मेरा सूरज ऐसा नही है ।" माँ ने पुरजोर विरोध तो किया पर रमा की बात कहीं गहरे मन में पैठ गई ।
"राम राम भाभी! तैयारी हो गई बिटवा की होसटल में जाने की!" अचानक लक्ष्मी ने आकर कहा तो लता चौंक गई ।
"हाँ लक्ष्मी, तैयारी तो हो गई । तुम जल्दी से सफाई बर्तन कर लो, तब तक मैं चाय बनाती हूँ फिर हमने निकलना भी तो है!" कहते कहते माँ ने रसोई से ही सूरज को आवाज लगाते हुए कहा
"आजा बेटा गर्म गर्म नाश्ता कर ले ।"
"आया माँ!" सूरज ने कमरे से ही जवाब दिया ।
"जल्दी आ बेटा ! गाड़ी भी आती ही होगी ।"
"माँ! आप चिंता न करें, सब पैकिंग हो गई है । बस सामान गाड़ी में रखना है ।" रसोई में आते हुए सूरज ने मुस्कुराते हुए कहा तो लता बोली -
"अच्छा सुन पहले लक्ष्मी से आशीर्वाद ले ले फिर नाश्ता करना!"
सूरज झट लक्ष्मी के चरण स्पर्श करने को झुक गया और अपनी जेब से सौ का नोट लक्ष्मी को देते हुए बोला- " आंटी बच्चों के लिये मिठाई ले लेना!"
सूरज के इस व्यवहार को देख लता भीतर तक खुशी से भीग गई । संस्कारों की मजबूत जड़ें अपनी जगह जमा चुकी थी सो संशय के बादल छंटने लगे । रमा खुशी खुशी सूरज के लिए नाश्ता लगाने लगी ।

मौलिक एवं स्वरचित
अंजू खरबंदा
दिल्ली

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